ना हो जंग पैदा बम्ब

हजारों लोग हैं यहाँ
यहाँ है फिर भी सन्नाटा
अचानक रुक गई है जिंदगी
किसने है इसे बांटा

यहाँ से कौन है गुज़रा
जो उजड़ी है ये फुलवारी
किसकी है ये करतूतें
जो हो गई मौन किलकारी

ना समझो हमे यूँ कमज़ोर
क्यूँ ललकारते हो दम
आए जो तुम कभी सामने
पाओगे तुम दना दन दन

उठे जो गलत निगाहे
उस निगाह को फोड़े हम
कोई जो पुष्प तोड़े हाथ
वो हाथ ना छोड़े हम


आओ सबको बतलाएं
यहाँ हमने है क्या सिखा
हर जात के पुष्प को
अपने लहू से हैं सींचा

अगर जो याद है बाबा
तो कान्हा भी ना भूले हम
एक और शांति का पाठ
दूजा गीता का मंथन

पडोसी की निगाहें हमको
अब चोरी से बचाएंगी
भाई भाई को भाई
ना कोई भाई बनायेंगी

आज जो दूर हो हमसे
ना भूलो हो हमारा अंश
हमारी माँ सगी बहने
आज हम मौसिओ के संग

कोई जो खोट हो दिल में
उस खोट को खोलो तुम
वर्ना रिश्तेदारी भूल के
रिश्तो की जड़े चीरें हम


जब हम रिश्ते में भाई है
क्यूँ कर सोचे होए जंग
अगर जो खुल गई जंग
तो हम काम आयेंगे

अपने लहू से सींच कर
ज़मी को सुर्ख बनायेंगे
बोएँगे बम्ब खेतो में
जो राजीव बम्ब कहायेंगे

हे प्रभु एक प्रार्थना है बस तुम देना ध्यान
ना हो जंग पैदा बम्ब इतना ही दो वरदान

सच बड़ा या झूठ

सच एक ऐसी चीज है
जो सब को नसीब है
लकिन आज के युग मे
कुछ की खो गई
कुछ रख कर भूल गए
कुछ के पास है
कुछ सत्यवादी हो गए

मै भी
सच को पूजता हूँ
हमेशा सम्भाल कर रखता हूँ
क्यूंकि उसका दुश्मन झूठ
हमेशा पिलाता है मुझे कड़वे घूँट
जब भी सच को सामने लाना चाहता हूँ
झूठ मुझे सताता हैअपना साम्राज्य याद दिलाता है
मुझसे कहता है
अरे मुर्खक्यूँ समय बर्बाद करता है
सच को याद करता है
मुझसे मांग जो मांगना है
किसको उल्टा किसको सीधा टांगना है

याद रख आज मेरा साम्राज्य है
और तुझे
किसी और का नहीं
सिर्फ मेरा हुकुम मानना है

अरे पापी
तुने एक बार हाथ बढाया था
मुझको अपनाया था
तुने सुना है दोस्त दोस्त के काम आता है
तू मुझे छोड़ के जाता है
मुझे देख
मै आज भी तेरे साथ हूँ था रहूँगा
तू ग़लत काम करयो
मै बचाता रहूँगा
अगर फिर भी
सच अपनाने की ठानी
छोड़ी न अपनी मनमानी
तो याद रख
आज तक तो दोस्ती देखी है
फिर पड़ेगी दुश्मनी निभानी
न पिटता हुआ पिटवा दूंगा
सरे आम मरवा दूंगा
दफ्तर में कलह
घर से निकलवा दूंगा
तू बड़ा मेरे बल पर छाती ताने घूमता है
अरे तन के सारे कपड़े उतरवा दूंगा
प्यार से कह रहा हूँ
दोस्त मान जा
सच से कुछ नहीं होने वाला
झूठ को पहचान जा
जब भी मेरे सामने ये घटना आती है
झूठ की याद सताती है
क्यूंकि जब भी सच बोला
दुख ही झेला

चुपचाप बताता हूँ
सच को भी पूजना चाहता हूँ
लेकिन
झूठ के डर से
तिजोरी में रखता हूँ
सामने लाने में घबराता हूँ

 रात्रि का दूसरा पहर सांसारिक चहल पहल में बढ़ोतरी का कारण है

सिर्फ रोया सिर्फ रोया


अभी मरे कुछ वक़्त हुआ था, डरे डरे कुछ वक़्त हुआ था
कौन हूँ मै, आया कैसे , क्या होगा सोच, जमा रक्त हुआ था
तभी किरण सी एक थी चमकी, ध्वनि कानो में एक धमकी
सभी अपने पूर्व में जाएँ,  अच्छे बुरे का सब हिसाब बताएँ
मै अपनी यादों में खोया हिसाब किया क्या पाया क्या खोया
आह!  सोचते ही सिर्फ रोया सिर्फ रोया..........

रातों को तो था मै सोया, स्वपनों में था सिर्फ मै खोया
दिनों को जागा, दिनों दिन भागा, सोया खोया, जागा भागा
पर इस चक्र में, कुछ ना पाया, सोचा जो क्या पाया क्या खोया
आह सोचते ही सिर्फ रोया सिर्फ रोया ..........

सभी तो थे, पर कोई ना था, सब कुछ था, कुछ ना था
जो जोड़ा था वो छोड़ा था, पर साथ ले जाऊं गुण थोडा था
खून के साथी साथ में ना थे, अवगुण थे गुण साथ ना थे
लकड़ी पाई अग्नि पाई, माटी माटी के संग आई
लोटा भर गंगाजल पाया, लगा मुझे क्यूँ था मै आया
सोचा जो क्या पाया क्या खोया,
आह सोचते ही सिर्फ रोया सिर्फ रोया..............

अब करने को हम ना थे, सहने को कोई ग़म ना थे
जो कुछ सहा सब छोड़ा छाडा, बस गज़ भर का लट्ठा फाड़ा
सफ़र में चलने को त्यारी, कंधो पे थी पालकी हमारी
सब के मुख एक ही सुर था, अंतिम यात्रा का ये गुर था
कहने को सब अपने थे, जागे हुए कुछ सपने थे
अब आँख मिची हम जागे हैं, मरघट छोड़ सब भागे है
सोचा जो क्या पाया क्या खोया
आह सोचते ही सिर्फ रोया सिर्फ रोया ..........

सांझ का आना कटु सत्य है

सुबह हुई सब उठ गए थे
मै अलसाया गुथ रहा था

क्यूँ हुई यह छद्म सुबह
बहकाती है बेवजह
ढले तलक ये दोडाएगी
अंत में फिर घर लाएगी
आना है तो जाना क्यूँ
बेकर्म कर्म पछताना क्यूँ
सुबह का आना पल भर है
पल भर को बाट जोहना क्यूँ

क्या सांझ की चाह हमें है
शीतलता की राह हमे है
जो देगी तीन पहर विश्राम
निश्चिन्तता को वो आराम
फिर काहे हम भूले साँझ
दिन का मैल बिना हम मांझ
सत्यता जब समक्ष खड़ी है
लुप्त गुप्त ये दिवस घडी है

आओ साँझ के घर को जाएँ
रिश्तों को हम और बढाएँ
आराम अंत विश्राम अनंत
पड़ाव ध्यान हैं साँझ के भाई
निद्रा, मूर्छा, निर्विघन चेतना
अंतिम वेदना सी बहने पाई
इनसे नाता है तुझे जोड़ना
दिवस ढले पड़े सब छोड़ना

मत कर जीवन अस्त व्यस्त
सांझ का आना है कटु सत्य

तलाश 
बिन बंधे सफों सा
पड़ा हूँ सुनसान बस्ती में 
समीर का हर झोंका
उड़ा जाता है कुछ सफे

तरसता हूँ एक हस्ती को
जो बांधे मुझे करीने से
या उड़ जाएगी मेरी हस्ती
इन सफाखोरों की बस्ती में

हमारा धर्म
आओ सुनाऊं तुमेह एक कहानी 
राम रहीम की थी दोस्ती पुरानी
चक्रम घंचक्रम चक्कर में रहते थे 
राम रहीम से लड़ते रहते थे 
राम रहीम का बस ध्येय था पढना 
सब को पछाड़ के आगे ही बढ़ना 
चक्रम घंचक्रम नालायक थे बड़े 
नफरत पाते रहते अलग थलग पड़े 
चक्रम घंचक्रम ने चाल एक चली 
राम रहीम पे फेंकी जात की डली
मच गई चहूँ ओर यह कैसी खलबली 
सब तरफ दुआओं की एक हवा चली 
राम रहीम न एक पाठ सिखाया 
ईद और दीप को फिर मिल  के मनाया 
दोस्ती दोनों की मिसाल बन गई 
चक्रम बन्धुओं की खिली उड़ गई 
आओ उठाएं हम भी यह कसम 
भारतीय हम हम सब एक धर्म
दोस्तों तुम भी सुनाना ये सबको कहानी 
राम रहीम की थी दोस्ती पुरानी.....
 

राधा हो चाहे मीरा हो
या हो बंसी श्याम की
तीनो ही ना हमें सुहावें
तीनो ना किसी काम की

राधा मीरा कुछ न कहती
बंसी अधरों पर ही रहती
कैसे कोई सुन पाये बोलो
बोली अपने श्याम की

तीनो ही ना हमें सुहावें, तीनो ना किसी काम की

हमको है अब श्याम से कहना
श्याम संग अब हमें भी रहना
वरना त्यागें अन्न जल हम सब
छोड़ें अपने प्राण जी

तीनो ही ना हमें सुहावें, तीनो ना किसी काम की

गीता का उपदेश ना भूले
प्रेम का सन्देश ना भूले
तीनो का हम भेद करे ना
दर्शन दो हमें श्याम जी

तीनो ही ना हमें सुहावें, तीनो ना किसी काम की

मीरा ने दीवानी बनकर
राधा ने सयानी बनकर
बंसी ने अधरों पर जमकर
पाया तुमको श्याम जी

तीनो ही ना हमें सुहावें, तीनो ना किसी काम की

हर पहर में तुमको जपते
दर्शन को हैं हम तरसते
तीनो से जो तुम थक जाओ
आओ अंगना श्यामजी

तीनो ही ना हमें सुहावें, तीनो ना किसी काम की


तीनो को हम पूजें तब ही
आप संग घनश्याम जी


"Control"

Who is controlling?
Procedure of coming
and going from world..
Feeling happiness
and sorrowfulness on earth..
Leaving and joining
Relationship in life
Watching the things
But not watching
The essential part for growing Things..
Who is controlling?
Oh God!
If you
Then where are you
Rajeev searching
Please come on earth
To control the things..

HUMANITY

Thinking a lot and imagine a plot
To concur the world with hole in boat
Without thinking to go self
Concur the heart by doing yourself
Find the way to catch the storm
Tipsy in mind to catch the sun's shine
To find deep the origin of earth
To find the way and aim of birth
Leave the thoughts of retaliation
Depart the act of inconsolable
Our dudgeon beats the drum of destruction
And destroying the human's constructions
Fighting for a piece of earth
Snatching the bread of others
Lets join and sign a song
That Humanity is the only cast
War will destroy human fast
You'll be remember by your past
Nothing will go in the last


जग में सुन्दर 
ममता की मूरत 
है अपनी माँ 
घूम के देखि 
दुनिया सारी
माँ नहीं मिली वहां
कष्ट झेल कर 
नौ नौ महीने 
दुनिया हमें दिखाती 
अपने खून को 
दूध बनाकर 
छाती से है पिलाती 
ऐसा दूध 
और ऐसी ममता 
हमको मिले कहाँ 
घूम के देखि 
दुनिया सारी 
माँ नहीं मिली वहां 

कहाँ के रिश्ते कहाँ के नाते 
यहीं के सब हैं यहीं रह जाते 
संसार एक मोहमाया जाल है 
योगी इसमें कहाँ फँस पाते 
तेरा जीवन तेरे करम पे 
तुझे वश करना है बस मन पे 
इसके जीते कब हारे जाते 
कहाँ के रिश्ते कहाँ के नाते


आत्मा के अमर होते ही 
भस्म हो गया शरीर 
संग पानी के डोलता फिरा 
चंचल मानव शरीर 

लिया इस जल को खींच
जड़ों ने, वृक्षों पौधों के 
बदली भस्म पुष्पों फलों 
वनस्पतिओं में 

भोजन स्वरुप वनस्पति को 
किया ग्रहण दम्पति ने 
यज्ञ किये शरीर में 
आत्माओं ने 

बदल रूप आई भस्म 
रक्त मांस के लघु कणों में 
जुड़े वो कण बिंदु 
गर्भ के क्षीर सागर में 

पुन  रूप बदल आई भस्मी 
लिए एक बालक का जीवन

सुबह की पहली किरण
अँधेरे का बढ़ता चरण

इधर रौशनी बढती है
उधर बढ़ता अन्धकार
परन्तु मानव बेखबर
आजाता है अंधकार



हे प्रभु एक विनती है तुमसे 
मोकु अग्लो जनम ना दीजो 
अगर भाग्य में जनम लिखा हो 
पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो 

ना ही चाहूँ सोना चांदी
ना ही चाहूँ महल दुमहले 
बस एक डंडा दिलवा दीजो 
पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो

पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो............

चोर डाकू कोई पकडूं नाही
रोज मै पूजूँ अफसरशाही 
चाय पानी लेकर छोडन का 
मोकु लाइसेंस दिलवा दीजो 

पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो..........

अफसर बनना मै ना चाहूँ 
कोई पदौन्ती मै ना पाऊं 
पर मेरी नियुक्ति तो प्रभु 
लाल बत्ती इलाके करवा दीजो 

पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो.............

रिश्ते नाते कोई ना चाहूँ 
घरवालों की बंदिश ना पाऊं
चाहूँ तो बस इतना चाहूँ 
बिन कटोरी बिन भीख के 
मांगना मुझको सिखला दीजो 

पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो............


मुझे याद क्यूँ ना कुछ रहा 
मैं भूल गया क्यूँ कल का सहा 

पानी मे वो प्रतिबिम्ब था 
प्रतिबिम्ब ने था मुझसे कहा 
जो तुझमे है वो उड़ेल दे 
हर्फों के सबको खेल दे 
तेरी वेदना या चेतना 
उसमे हो तेरा लिखा सना 
जो पाया मैंने संचय किया 
लिखने वो बैठा जो था सहा 

पर हाय रे यह क्या हुआ 
मैं भूल गया क्यूँ कल का सहा 

एक बार फिर एक राह दिखी 
मरू मैं बैठा लिखने अपनी लिखी 
मैंने अपने को फिर छुआ 
बचा कूचा फिर हर्फ़ हुआ 
मरू की शांति संग थी 
मेरी वो भ्रान्ति तंग थी 
मै लिखता जाता हर कण में 
वो छुपता जाता हर क्षण मे
मैं पुनः जो बैठा लिखने को

पर हाय रे यह क्या हुआ 
मैं भूल गया क्यूँ कल का सहा


देखो मेरी भौर हो गयी 
एक डाली पर चिडिया चहके
एक दीवारे तुम 
ना ही चहकना वो भूलती 
ना ही चहकना तुम 

उसके सुर 
या तुम्हारे सुर 
ना कुछ अंतर विशेष है 
बस तुम दोनों की चहक
मेरा हर दिवस में प्रवेश है 

मौसम बांध सके ना दोनों 
ना दोनों की मीठी बोली 

उठ देख धूप चहुँ ओर हो गई 
देखो मेरी भौर हो गयी



हम अपने ह्रदय की कहैं किसे
यहाँ कौन है जो हमको बांचे
सब रसिक यहाँ सुनने वाले
है कोई यहाँ जो हममे झांके

हम काव्य पाठ करने वाले
भीतर तूफ़ान भी रखते हैं
कोई कभी ज़रा छुए हमको
हम अपनी आँख भी भरते हैं

हम दर्द संजोते भीतर ही
तुम सुन हमे दर्द मिटाते हो
हम अपने घाव कुरेदते हैं 
तुम उनसे औषधि पाते हो  

अपने अन्दर की पीड़ा को
हम शब्दों से तुम्हे बतातें हैं
जो हमने सहा वो लिखते हैं
तुम सुन कर बस मुस्काते हो


हम भांति भांति के वृक्ष सभी
तुम चुन चुन हमे बुलाते हो
कोई फूल है या हो फल कोई
तुम हममे भी भेद कराते हो


तुम्हारी चाहत के हर रस का
हम तुम्हे रसपान कराते हैं
गन्ने सी पाकर  अपनी गत
 हम तुम्हे हर रस दे पाते हैं 

एक चाहत है गर तुम जो सुनो
कोई मर्म ना तुम किसीको देना
जो लगे तुम्हे कोई पीड़ा ग्रस्त 
हमारे कुछ छंद सुना देना 

राजीव जाने के बाद हम
पाँचों में विलय हो जायेंगे  
पर काव्य पाठ करने वाले 
  मरने पर जीवित हो पाएंगे     



हम साहित्य की बात कर रहे थे
क्या होगा साहित्य का
यह सोच सोच कर डर रहे थे
कैसे बचाएं यह धरोअर इस उजड़ते समाज से
और कैसे अब बचाए इसे महा पंडितों के दाग से

अचानक विपरीत पक्ष से सवाल दगा गया

साहित्य किसे कहते हैं ?
जवाब दिया जिसके बलबूते हम सभ्य शिक्षा पाते हैं
जिसके कारण हम सबके हित की कहते, गाते  हैं
जिसके रिश्तेदार अब जीवन के आखिरी पड़ाव में हैं
जो वयस्क हैं वो व्यवसायिक अंश के जकडाव में हैं

फिर सवाल आया साहित्य कहाँ है?
मै  कहता पग पग में
अचानक पूछ लिया साहित्य को कहाँ ढूंढे?
महसूस करो हर पल में

वो बोले पहचान बताओ 
हम बोले पहचान है तुम्हारी हर साँस
तुम्हारी जिय्गासा तुम्हारी हर आस
उसे खोजने की चाह उसके लिए हर आह
तुम्हारे जीवन की प्रतिभद्ता समाज की कुछ बचीकुची सभ्यता
रिश्तों की धुंधली मिठास पत्नी के मन का विश्वास
बहन की राखी की लाज, पति का पत्नी पर नाज
पिता का पुत्र पर अधिकार माँ की गोद का अहसास
एक घर एक परिवार एक गाँव एक संसार और हर क्षण की प्यास
हर गीत हर संगीत धरती आकाश हर भीत और हर ओर की राह

अरे जहाँ चाहो वो मिलता है उसके बिना पत्ता भी ना हिलता है
इससे पहले कुछ और पूछे हम ताव खा गए
और कह दिया तुम जो बचे हो साहित्य उसका कारण है
अगर हम साहित्य के नजदीक ना होते तुम यहीं खेत होते 

तुम चाहो भी तो लुप्त ना होगा छिपाओगे पर गुप्त ना होगा   
सांसें चलती उसकी लय में संसार चलता उसकी शय में 
अगर जीवन है तो साहित्य है अगर मरण है तो साहित्य है
साहित्य समय का हर चरण है  हमने ओढ़ा वो आवरण है 





कहाँ के रिश्ते कहाँ के नाते
यहीं के सब हैं यहीं रह जाते

संसार एक मोहमाया जाल है
योगी इसमें कहाँ फँस पाते

तेरा जीवन तेरे करम पर
वश करना है बस मन पर

मन को जीते कब हारे जाते
कहाँ के रिश्ते कहाँ के नाते

        

आज दिन भर मुलाकात ना हो सकी अपनेआप से
सिवाय मेरे हर व्यक्ति मिला मुझ बड़े साहेब से

ढले हुए सूरज की शीतल रौशनी मै
मुस्कुराता मस्तीभरा चला
लिए मिलने की चाह अपनेआप से

परन्तु हर रोज की तरह
यादों ने छीन लिया
अकेलापन मुझसे
रह गई अधूरी चाह
मिलने की अपनेआप से

आज मिल ना सका
कोई गम नहीं
फिर किसी अच्छे दिन
लूँगा मिलने का appointment अपनेआप से

           

हे प्रभु क्यूँ इस जहान पर इतना अत्याचार किया
जनम दिलवा माँ बाप से सबको करजदार किया

कैसे कर्जा चुकाऊं मैं यह सोच सारा जनम गया
पर कर्जा माँ बाप का मेरे संग आया संग ही गया 

तेरी लीला तू जाने राजीव ना पूछे यह सब क्यूँ किया
पर एक बात तू सच बता तुने तेरे कर्जे का क्या किया




हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये

ग्वाल बनू और बाल संग खेलूं
तू बिलोये मै माखन लेलूं
मेरा भी जी छाए

हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये

जमुना जांऊ गोते लगाऊं
मटकी फोडूं और छुप जांऊ
तू आवे धमकावे

हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये

कदम्ब चढ़ जाएँ गोपीआं नहायें
वस्त्र चुराए कान्हा और वो लज्जायें
कान्हा की लीलायं
हम भी देखनो चाहें

हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये

काहे जन्मा  पथरान मैं मै
माटी मथुरा ना चख पायो
ब्रज मोहे कह कह चिदावे

हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये

कान्हा सखा का रूप मै पातो
सुदामा के संग मै भी रिझातो
और कछु ना मै चाहतो 

हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये

कान्हा सुनता है सबकी सुनो
जो कछु चाहो वासे मांग लीनो
राजीव कही कही गावे

हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये

लोग आत्मकथा लिखते है

क्या ऐसे हैं
जैसे वो लिखते हैं

या लिखने जैसा
वो सभी दीखते हैं

लोग आत्मकथा लिखते है




मानव सभ्य है या असभ्य
यदि सभ्य है
तो क्या ज़रुरत
संविधान और कानून की

यदि असभ्य है
तो क्या ज़रुरत
संविधान और कानून की

सभ्य समाज
संविधान, कानून
नियंत्रण और कचेहरी

अजब विडंबना है



गंगा नहाये पाप धुले, साबुन धोये मैल |
ऐसो कलंक ना पाइओ, ना छुटे कहूँ गैल ||

मौत आ जाये तो मैं जिंदगी पाऊं |
मरने की चाहत मैं जिए चला जाऊं ||

मन को भँवरा बना के काहे ढूंढे फूल|
खुशबु तेरे तन छुपे काहे फांके चूल ||

मन की नाव डोली फिरे, छोर नज़र ना आये |
राजीव छोर भीतर छिपा काहे धुधन जाये ||

नारी को ना समझो तुम नारी है कितनी कमज़ोर |
नारी से ही नर जन्मता नर की शक्ति उसमे जोड़ ||

दर्द का मर्म ना जाने कोई हर ज़ख्म से इसका रिश्ता है |
कभी हलक से कभी पलक से पल पल पल पल रिसता है ||

मूक रहो तो जग समझे किता तोकू ज्ञान |
राजीव मुह खुलते ही खुले ज्ञानी को अज्ञान ||

मुस्कराहट तेरा क्या कहना |
स्वर्ग का एहसास तेरा बहना ||

धरती को तुम जितना खोदो जितना छेदों
                    कुछ ना कुछ ये देती है |
राजीव जाने का समय जब आये तो देखो
                     बाँहों में तुमेह भर लेती है ||

सुई से तलवार तक क्यूँ कोई जान ना पाए |
शब्दों में है क्या छुपा जो घाव गंभीर बनाय||

किती मानव भूल करे जोहे मौत की बात
मौत तो वाके संग रहे रूप बदल कर ठाट |
रूप बदल कर ठाट कबहू दबोचे तोकू
राजीव समझ यह सच अगर समझे तोकू ||

मेरी (बूंद) क्या बिसात जो सागर से मुकाबला करूँ |
पर सागर रखे ज्ञात मुझ बूंद से उसका अस्तित्व है ||

कैसा ये मोड़ आया
जिंदगी हो गई खड़ी
दूर होती जा रही
रिश्ते की हर लड़ी

मौत जिंदगी को तू कब तक ढोना चाहेगी
समय समय पर उसको छध्म बाग़ दिखाएगी
बेचारी जिंदगी तेरे चुंगल से कब छुट पायेगी
राजीव बता, एक दिन ये सवयं मौत बन जायगी

छदम भेष धारण किये, पल पल हमे ललचाये |
कभी ये जीवन कभी ये रिश्ते जोडन को मचलाए||

चक्षु घुमे चहुँ ओर देखे दुनिया सारी|
क्यूँ ना देखे तन जामे चक्षु उभारी||

राजीव देखे जग को जग कबहू  अपना होई |
एक बार कर आँख बंद जग एक सपना होई ||

महक महक की सुनो कोई ज़ुबां नहीं होती
महक महकेगी कहाँ यह कभी नहीं कहती

थुल थुल बदन को देख कर ब्रह्म ताक़त का होय
राजीव मांस की यह गाड़ी एक पल मैं माटी होय

आज हम लिखतें हैं तुम सुनना नहीं चाहते 
कल जब सुनना चाहोगे लिखने वाला ना होगा