कहाँ के रिश्ते कहाँ के नाते
यहीं के सब हैं यहीं रह जाते
संसार एक मोहमाया जाल है
योगी इसमें कहाँ फँस पाते
तेरा जीवन तेरे करम पर
वश करना है बस मन पर
मन को जीते कब हारे जाते
कहाँ के रिश्ते कहाँ के नाते
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जीवन दरिया
आज दिन भर मुलाकात ना हो सकी अपनेआप से
सिवाय मेरे हर व्यक्ति मिला मुझ बड़े साहेब से
ढले हुए सूरज की शीतल रौशनी मै
मुस्कुराता मस्तीभरा चला
लिए मिलने की चाह अपनेआप से
परन्तु हर रोज की तरह
यादों ने छीन लिया
अकेलापन मुझसे
रह गई अधूरी चाह
मिलने की अपनेआप से
आज मिल ना सका
कोई गम नहीं
फिर किसी अच्छे दिन
लूँगा मिलने का appointment अपनेआप से
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स्वयं
हे प्रभु क्यूँ इस जहान पर इतना अत्याचार किया
जनम दिलवा माँ बाप से सबको करजदार किया
कैसे कर्जा चुकाऊं मैं यह सोच सारा जनम गया
पर कर्जा माँ बाप का मेरे संग आया संग ही गया
तेरी लीला तू जाने राजीव ना पूछे यह सब क्यूँ किया
पर एक बात तू सच बता तुने तेरे कर्जे का क्या किया
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क़र्ज़
हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ग्वाल बनू और बाल संग खेलूं
तू बिलोये मै माखन लेलूं
मेरा भी जी छाए
हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
जमुना जांऊ गोते लगाऊं
मटकी फोडूं और छुप जांऊ
तू आवे धमकावे
हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
कदम्ब चढ़ जाएँ गोपीआं नहायें
वस्त्र चुराए कान्हा और वो लज्जायें
कान्हा की लीलायं
हम भी देखनो चाहें
हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
काहे जन्मा पथरान मैं मै
माटी मथुरा ना चख पायो
ब्रज मोहे कह कह चिदावे
हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
कान्हा सखा का रूप मै पातो
सुदामा के संग मै भी रिझातो
और कछु ना मै चाहतो
हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
कान्हा सुनता है सबकी सुनो
जो कछु चाहो वासे मांग लीनो
राजीव कही कही गावे
हो मैया मोरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
ओरी माँ मेरी कान्हा अब क्यूँ ना आये
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बाल मन
लोग आत्मकथा लिखते है
क्या ऐसे हैं
जैसे वो लिखते हैं
या लिखने जैसा
वो सभी दीखते हैं
लोग आत्मकथा लिखते है
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आत्मकथा
मानव सभ्य है या असभ्य
यदि सभ्य है
तो क्या ज़रुरत
संविधान और कानून की
यदि असभ्य है
तो क्या ज़रुरत
संविधान और कानून की
सभ्य समाज
संविधान, कानून
नियंत्रण और कचेहरी
अजब विडंबना है
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विडंबना
गंगा नहाये पाप धुले, साबुन धोये मैल |
ऐसो कलंक ना पाइओ, ना छुटे कहूँ गैल ||
मौत आ जाये तो मैं जिंदगी पाऊं |
मरने की चाहत मैं जिए चला जाऊं ||
मन को भँवरा बना के काहे ढूंढे फूल|
खुशबु तेरे तन छुपे काहे फांके चूल ||
मन की नाव डोली फिरे, छोर नज़र ना आये |
राजीव छोर भीतर छिपा काहे धुधन जाये ||
नारी को ना समझो तुम नारी है कितनी कमज़ोर |
नारी से ही नर जन्मता नर की शक्ति उसमे जोड़ ||
दर्द का मर्म ना जाने कोई हर ज़ख्म से इसका रिश्ता है |
कभी हलक से कभी पलक से पल पल पल पल रिसता है ||
मूक रहो तो जग समझे किता तोकू ज्ञान |
राजीव मुह खुलते ही खुले ज्ञानी को अज्ञान ||
मुस्कराहट तेरा क्या कहना |
स्वर्ग का एहसास तेरा बहना ||
धरती को तुम जितना खोदो जितना छेदों
कुछ ना कुछ ये देती है |
राजीव जाने का समय जब आये तो देखो
बाँहों में तुमेह भर लेती है ||
सुई से तलवार तक क्यूँ कोई जान ना पाए |
शब्दों में है क्या छुपा जो घाव गंभीर बनाय||
किती मानव भूल करे जोहे मौत की बात
मौत तो वाके संग रहे रूप बदल कर ठाट |
रूप बदल कर ठाट कबहू दबोचे तोकू
राजीव समझ यह सच अगर समझे तोकू ||
मेरी (बूंद) क्या बिसात जो सागर से मुकाबला करूँ |
पर सागर रखे ज्ञात मुझ बूंद से उसका अस्तित्व है ||
कैसा ये मोड़ आया
जिंदगी हो गई खड़ी
दूर होती जा रही
रिश्ते की हर लड़ी
मौत जिंदगी को तू कब तक ढोना चाहेगी
समय समय पर उसको छध्म बाग़ दिखाएगी
बेचारी जिंदगी तेरे चुंगल से कब छुट पायेगी
राजीव बता, एक दिन ये सवयं मौत बन जायगी
छदम भेष धारण किये, पल पल हमे ललचाये |
कभी ये जीवन कभी ये रिश्ते जोडन को मचलाए||
चक्षु घुमे चहुँ ओर देखे दुनिया सारी|
क्यूँ ना देखे तन जामे चक्षु उभारी||
राजीव देखे जग को जग कबहू अपना होई |
एक बार कर आँख बंद जग एक सपना होई ||
महक महक की सुनो कोई ज़ुबां नहीं होती
महक महकेगी कहाँ यह कभी
नहीं कहती
थुल थुल बदन को देख कर ब्रह्म ताक़त का होय
राजीव मांस की यह गाड़ी एक पल मैं माटी होय
आज हम लिखतें हैं तुम सुनना नहीं चाहते
कल जब सुनना चाहोगे लिखने वाला ना होगा
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विचार
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