हे प्रभु एक विनती है तुमसे 
मोकु अग्लो जनम ना दीजो 
अगर भाग्य में जनम लिखा हो 
पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो 

ना ही चाहूँ सोना चांदी
ना ही चाहूँ महल दुमहले 
बस एक डंडा दिलवा दीजो 
पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो

पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो............

चोर डाकू कोई पकडूं नाही
रोज मै पूजूँ अफसरशाही 
चाय पानी लेकर छोडन का 
मोकु लाइसेंस दिलवा दीजो 

पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो..........

अफसर बनना मै ना चाहूँ 
कोई पदौन्ती मै ना पाऊं 
पर मेरी नियुक्ति तो प्रभु 
लाल बत्ती इलाके करवा दीजो 

पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो.............

रिश्ते नाते कोई ना चाहूँ 
घरवालों की बंदिश ना पाऊं
चाहूँ तो बस इतना चाहूँ 
बिन कटोरी बिन भीख के 
मांगना मुझको सिखला दीजो 

पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो............


मुझे याद क्यूँ ना कुछ रहा 
मैं भूल गया क्यूँ कल का सहा 

पानी मे वो प्रतिबिम्ब था 
प्रतिबिम्ब ने था मुझसे कहा 
जो तुझमे है वो उड़ेल दे 
हर्फों के सबको खेल दे 
तेरी वेदना या चेतना 
उसमे हो तेरा लिखा सना 
जो पाया मैंने संचय किया 
लिखने वो बैठा जो था सहा 

पर हाय रे यह क्या हुआ 
मैं भूल गया क्यूँ कल का सहा 

एक बार फिर एक राह दिखी 
मरू मैं बैठा लिखने अपनी लिखी 
मैंने अपने को फिर छुआ 
बचा कूचा फिर हर्फ़ हुआ 
मरू की शांति संग थी 
मेरी वो भ्रान्ति तंग थी 
मै लिखता जाता हर कण में 
वो छुपता जाता हर क्षण मे
मैं पुनः जो बैठा लिखने को

पर हाय रे यह क्या हुआ 
मैं भूल गया क्यूँ कल का सहा


देखो मेरी भौर हो गयी 
एक डाली पर चिडिया चहके
एक दीवारे तुम 
ना ही चहकना वो भूलती 
ना ही चहकना तुम 

उसके सुर 
या तुम्हारे सुर 
ना कुछ अंतर विशेष है 
बस तुम दोनों की चहक
मेरा हर दिवस में प्रवेश है 

मौसम बांध सके ना दोनों 
ना दोनों की मीठी बोली 

उठ देख धूप चहुँ ओर हो गई 
देखो मेरी भौर हो गयी



हम अपने ह्रदय की कहैं किसे
यहाँ कौन है जो हमको बांचे
सब रसिक यहाँ सुनने वाले
है कोई यहाँ जो हममे झांके

हम काव्य पाठ करने वाले
भीतर तूफ़ान भी रखते हैं
कोई कभी ज़रा छुए हमको
हम अपनी आँख भी भरते हैं

हम दर्द संजोते भीतर ही
तुम सुन हमे दर्द मिटाते हो
हम अपने घाव कुरेदते हैं 
तुम उनसे औषधि पाते हो  

अपने अन्दर की पीड़ा को
हम शब्दों से तुम्हे बतातें हैं
जो हमने सहा वो लिखते हैं
तुम सुन कर बस मुस्काते हो


हम भांति भांति के वृक्ष सभी
तुम चुन चुन हमे बुलाते हो
कोई फूल है या हो फल कोई
तुम हममे भी भेद कराते हो


तुम्हारी चाहत के हर रस का
हम तुम्हे रसपान कराते हैं
गन्ने सी पाकर  अपनी गत
 हम तुम्हे हर रस दे पाते हैं 

एक चाहत है गर तुम जो सुनो
कोई मर्म ना तुम किसीको देना
जो लगे तुम्हे कोई पीड़ा ग्रस्त 
हमारे कुछ छंद सुना देना 

राजीव जाने के बाद हम
पाँचों में विलय हो जायेंगे  
पर काव्य पाठ करने वाले 
  मरने पर जीवित हो पाएंगे     



हम साहित्य की बात कर रहे थे
क्या होगा साहित्य का
यह सोच सोच कर डर रहे थे
कैसे बचाएं यह धरोअर इस उजड़ते समाज से
और कैसे अब बचाए इसे महा पंडितों के दाग से

अचानक विपरीत पक्ष से सवाल दगा गया

साहित्य किसे कहते हैं ?
जवाब दिया जिसके बलबूते हम सभ्य शिक्षा पाते हैं
जिसके कारण हम सबके हित की कहते, गाते  हैं
जिसके रिश्तेदार अब जीवन के आखिरी पड़ाव में हैं
जो वयस्क हैं वो व्यवसायिक अंश के जकडाव में हैं

फिर सवाल आया साहित्य कहाँ है?
मै  कहता पग पग में
अचानक पूछ लिया साहित्य को कहाँ ढूंढे?
महसूस करो हर पल में

वो बोले पहचान बताओ 
हम बोले पहचान है तुम्हारी हर साँस
तुम्हारी जिय्गासा तुम्हारी हर आस
उसे खोजने की चाह उसके लिए हर आह
तुम्हारे जीवन की प्रतिभद्ता समाज की कुछ बचीकुची सभ्यता
रिश्तों की धुंधली मिठास पत्नी के मन का विश्वास
बहन की राखी की लाज, पति का पत्नी पर नाज
पिता का पुत्र पर अधिकार माँ की गोद का अहसास
एक घर एक परिवार एक गाँव एक संसार और हर क्षण की प्यास
हर गीत हर संगीत धरती आकाश हर भीत और हर ओर की राह

अरे जहाँ चाहो वो मिलता है उसके बिना पत्ता भी ना हिलता है
इससे पहले कुछ और पूछे हम ताव खा गए
और कह दिया तुम जो बचे हो साहित्य उसका कारण है
अगर हम साहित्य के नजदीक ना होते तुम यहीं खेत होते 

तुम चाहो भी तो लुप्त ना होगा छिपाओगे पर गुप्त ना होगा   
सांसें चलती उसकी लय में संसार चलता उसकी शय में 
अगर जीवन है तो साहित्य है अगर मरण है तो साहित्य है
साहित्य समय का हर चरण है  हमने ओढ़ा वो आवरण है