हम साहित्य की बात कर रहे थे
क्या होगा साहित्य का
यह सोच सोच कर डर रहे थे
कैसे बचाएं यह धरोअर इस उजड़ते समाज से
और कैसे अब बचाए इसे महा पंडितों के दाग से
अचानक विपरीत पक्ष से सवाल दगा गया
साहित्य किसे कहते हैं ?
जवाब दिया जिसके बलबूते हम सभ्य शिक्षा पाते हैं
जिसके कारण हम सबके हित की कहते, गाते हैं
जिसके रिश्तेदार अब जीवन के आखिरी पड़ाव में हैं
जो वयस्क हैं वो व्यवसायिक अंश के जकडाव में हैं
फिर सवाल आया साहित्य कहाँ है?
मै कहता पग पग में
अचानक पूछ लिया साहित्य को कहाँ ढूंढे?
महसूस करो हर पल में
वो बोले पहचान बताओ
हम बोले पहचान है तुम्हारी हर साँस
तुम्हारी जिय्गासा तुम्हारी हर आस
उसे खोजने की चाह उसके लिए हर आह
तुम्हारे जीवन की प्रतिभद्ता समाज की कुछ बचीकुची सभ्यता
रिश्तों की धुंधली मिठास पत्नी के मन का विश्वास
बहन की राखी की लाज, पति का पत्नी पर नाज
पिता का पुत्र पर अधिकार माँ की गोद का अहसास
एक घर एक परिवार एक गाँव एक संसार और हर क्षण की प्यास
हर गीत हर संगीत धरती आकाश हर भीत और हर ओर की राह
अरे जहाँ चाहो वो मिलता है उसके बिना पत्ता भी ना हिलता है
इससे पहले कुछ और पूछे हम ताव खा गए
और कह दिया तुम जो बचे हो साहित्य उसका कारण है
अगर हम साहित्य के नजदीक ना होते तुम यहीं खेत होते
तुम चाहो भी तो लुप्त ना होगा छिपाओगे पर गुप्त ना होगा
सांसें चलती उसकी लय में संसार चलता उसकी शय में
अगर जीवन है तो साहित्य है अगर मरण है तो साहित्य है
साहित्य समय का हर चरण है हमने ओढ़ा वो आवरण है

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