सांझ का आना कटु सत्य है
सुबह हुई
सब उठ गए
थे
मै अलसाया गुथ रहा था
क्यूँ हुई यह छद्म सुबह
बहकाती है बेवजह
ढले तलक ये दोडाएगी
अंत में फिर घर लाएगी
मै अलसाया गुथ रहा था
क्यूँ हुई यह छद्म सुबह
बहकाती है बेवजह
ढले तलक ये दोडाएगी
अंत में फिर घर लाएगी
आना है तो जाना क्यूँ
बेकर्म कर्म पछताना क्यूँ
सुबह का आना पल भर है
पल भर को बाट जोहना क्यूँ
बेकर्म कर्म पछताना क्यूँ
सुबह का आना पल भर है
पल भर को बाट जोहना क्यूँ
क्या सांझ की चाह हमें है
शीतलता की राह हमे है
जो देगी तीन पहर विश्राम
निश्चिन्तता को वो आराम
फिर काहे हम भूले साँझ
दिन का मैल बिना हम मांझ
सत्यता जब समक्ष खड़ी है
लुप्त गुप्त ये दिवस घडी है
आओ साँझ के घर को जाएँ
रिश्तों को हम और बढाएँ
आराम अंत विश्राम अनंत
पड़ाव ध्यान हैं साँझ के भाई
निद्रा, मूर्छा, निर्विघन चेतना
अंतिम वेदना सी बहने पाई
इनसे नाता है तुझे जोड़ना
दिवस ढले पड़े सब छोड़ना
मत कर जीवन अस्त व्यस्त
सांझ का आना है कटु सत्य

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